| Spiritual Books In Hindi |
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टकराव टालिए |
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जिस तरह हम रास्ते पर सँभलकर चलते है, फिर सामनेवाला आदमी कितना भी बुरा हो और वह हम से टकराये और हमारा नुकसान करे, वह अलग बात है। लेकिन हमारा इरादा नुकसान पहुँचाने का नहीं होना चाहिए। अगर हम उसे नुकसान पहुँचाने जायें तो उसमें हमारा भी नुकसान होनेवाला है। अर्थात प्रत्येक टकराव में सदैव दोनों को ही नुकसान होता है। आप सामनेवाले को दुःख पहुँचायें उसी के साथ आपको भी, ओन द मूमेन्ट (उसी क्षण) दुःख पहुँचे बिना नहीं रहेगा। यही टकराव है।
इसिलए मैं ने उदाहरण दिया है कि रोड पर ट्रेफिक का धर्म क्या है कि टकराओगे तो मर जाओगे। टकराने में जोखिम है, इसिलए किसी के साथ मत टकराना। इसी प्रकार व्यवहारिक कार्या में भी मत टकराव टालिए। |
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~दादाश्री |
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एडजस्ट एवरीव्हेयर |
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संसार में और कुछ नहीं आता है, तो उसमें कोई हर्ज नहीं है, मगर ’एडजस्ट ’ होना तो आना ही चाहिए। सामनेवाला ’डिस्एडजस्ट ’ होता रहे और हमें एडजस्ट होना आता है, तो हमें कोई दुःख नहीं होगा। इसलिए सभी के साथ ’एडजस्टमेन्ट’ हो, वही सब से बड़ा धर्म है। इस काल में तो लोगों की प्रकृतियाँ भिन्न भिन्न होती है, इसिलए ’एडजस्ट’ हुए बगैर कैसे चलेगा?
हमने इस संसार की बहुत सूक्ष्म खोज की थी। अंतिम प्रकार की खोज के बाद हम यह सब बातें आपको बता रहे हैं। व्यवहार में कैसे रहना यह भी समझाते हैं और मोक्ष में कैसे जायें, यह भी बता रहे है। आपकी मुशिकलें किस तरह कम हों, यही हमारा ध्येय है। |
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~दादाश्री |
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भुगते उसी की भूल! |
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यह जेब कटी, उसमें भूल किसकी? इनकी जेब नहीं कटी और आपकी ही क्यों कटी? आप दोनो में से अभी कौन भुगत रहा है ’भुगते उसी की भूल।’
’भुगते उसी की भूल’ यह सिद्धांत मोक्ष में ले जानेवाला है। यदि कोई पूछे कि मैं अपनी भूलें कैसे खोजूं? तो हम उसे बतायेगें कि ’तुम्हें जहाँ जहाँ भुगतना पड़ रहा है, वह तुम्हारी ही भूल है। तुम्हारी एसी क्या भूल हुई होगी कि ऐसे भूगतना पड़ रहा हैं, वह तुम्हें ढूँढ निकालना हैं।’ हमें तो सारा दिन ही भुगतना पड़ता है, इसलिए ढूँढ निकालना चाहिए कि हम से क्या क्या भूलें हुई है। हम अपनी ही भूलों से बंधे हैं। दूसरे लोगों ने हमें नहीं बांधा है। भूल सुधर गयी कि मुक्त हुए। |
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~दादाश्री |
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हुआ सो न्याय! |
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कुदरत के न्याय को समझोगे कि ’हुआ सो न्याय,’ तो आप इस संसार से मुक्त हो सकोगे। अगर कुदरत को जरा भी अन्यायी मानोगे तो आपका संसार में उलझने का कारण वह ही है। कुदरत को न्यायी मानना, उसी का नाम ज्ञान। ’जैसा है वैसा’ जानना, उसी का नाम ज्ञान और ’जैसा है वैसा’ नहीं जानना, उसी का नाम अज्ञान
’हुआ सो न्याय’ समझें तो संसार से पार हो जायें, ऐसा है। दुनिया में एक क्षण भी अन्याय होता नहीं है। न्याय ही हो रहा है। बुद्धि हमें फँसाती है कि यह न्याय कैसे कहलाये? इसिलए हम असली बात बताना चाहते हैं कि यह न्याय कुदरत का है और आप बुद्धि से अलग हो जाये। एक बार समझ लेने के बार हमें बुद्धि का कहा नहीं मानना चाहिए। हुआ सो ही न्याय। |
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~दादाश्री |
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मैं कौन हूँ? |
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जीवन का ध्येय
यदि यह संसार आपको पुसाता (हरकत नहीं करता) हो तो आगे कुछ भी समझने की जरुरत है।
अध्यात्म में स्व-रूप को जानने की जरूरत है। मैं कौन हूँ। यह जानने पर सारे पझल सोल्व हो जायें। |
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~दादाश्री |
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चिंता |
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प्रयत्न कीजिये पर चिंता मत कीजिये कुदरत क्या करती है कि कार्य नहीं होता तो प्रयत्न कीजिये, जबरदस्त प्रयत्न कीजिये, लेकिन चिंता मत कीजिये। क्योंकि चिंता करने से उस कार्य को धक्का पहुँचेगा और चिंता करनेवाला, लगाम खुद अपने हाथों में ले लेता है, मानो की मैं ही चलाता हूँ। उसका गुनाह लागू होता है।
यह जगत कौन चलाता है। यह जानें तो हमें चिंता नहीं होगी। |
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~दादाश्री |
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क्रोध |
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ये क्रोध, मान, माया और लोभ ही सारी कमजोरियाँ हैं जो बलवान है उसे क्रोध करने की जरूरत ही कहाँ रही? यह तो क्रोध से सामनेवाले को वश में करने जाता है। पर जिसे क्रोध नहीं है, तो उसके पास कुछ तो होगा न? उसके पास शील नामक चारित्र होता है, उससे जानवर तक वश में हो जाते है। बाघ, शेर, दुश्मन सभी सारा लश्कर वश में हो जायें। |
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~दादाश्री |
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Atmabodh |
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कमल और पानी को कोई झगडा नहीं है। ऐसे संसार और ज्ञान को कोई झघडा नहीं। दोनों अगल है। मात्र wrong brlief है।
ज्ञानी पुरुष सब wrong belief को fracture कर देते है और संसार विमुख है। जब ज्ञानी से सन्मुख हो जाएगा, तब संसार छूट जाएगा। |
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~दादाश्री |
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कर्म का विज्ञान |
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मैं ने किया बोला कि कर्मबंध हो जाता है। ये मैं ने किया इसमें इगोइझ्म (अहंकार) है और ईगोईझम से कर्म बंधाता है। जिघर ईगोईझ्म ही नहीं, मैं ने किया ऐसा ही नहीं है, वहाँ कर्म नहीं होता है। |
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~दादाश्री |
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सर्व दुःखों से मुक्ति |
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दुःख तो only wrong belief ही है। जिसको wrong belief है, वहाँ दुःख है। जिसको wrong belief नहीं, वहाँ दुःख नहीं है। |
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~दादाश्री |
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ज्ञानी पुरुष की पहचान |
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कभी ज्ञानी पुरुष मिल जाये, तो मुक्त पुरुष है, परमेनन्ट मुक्त है, एेसा कोई मिल जाये तो अपना काम हो जाता है। शास्त्रों के ज्ञानी तो बहुत है, मगर उससे तो कोई काम नहीं चलेगा। सच्चा ज्ञानी चाहिए और मुक्त पुरुष चाहिए, मोक्ष का दान देनावाला चाहिए। |
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~दादाश्री |
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वर्तमान तीर्थंकर श्री सीमंधर स्वामी |
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घर घर में सीमंधर स्वामी की पूजा और आरती होगी और जगह जगह सीमंधर स्वामी के देरासर (मंदिर) निर्माण होंगे, तब दुनिया का नक्शा कुछ ओर ही होगा। |
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~दादाश्री |
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